sugandha

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

आज नहीं तो कभ्ळाा नहीं
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रवींद्र
मध्य प्रदेश के अजाने से गाँव परा में पैदा हुआ। मिहोना से शुरू हुआ सफर निरंतर जारी है। १९७१ की लडाई में अचानक एक सपना पला सम्पादक बनने का। पूरा भी हो गया। ग्वालियर के आचरण से चल कर अमर उजाला जम्मू तक आने के बाद भी जब हासिल वाला खाना टटोलता हूँ खाली ही मिलता है। बहुत कुछ छूट गया ..... गाँव, घर, लोग, रिश्ते, सुकून...... और शायद मोहब्बत। जेब में हैं कुछ यादें, कुछ अपने, कुछ तल्खियाँ, कुछ नाकामियां, कुछ उदासियाँ ... और चंद बेहद हसीन लम्हे। इसी पूंजी से जारी है जीवन का कारोबार।
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